एक बार उलझना है तुमसे काफ़ी कुछ सुलझाने के लिए

आकांक्षा   ,प्यार  , ख्वाहिशें  ..यह  जो  भारी  भरकम शब्द  है न   शब्द   जो कि केवल मरवाता है । क्यूंकि सच्चाई यह है कि  99 % लोग यहाँ पर खुदगर्ज  होते  है ।  सच्चाई कड़वी   है लकिन कबूलना तो पड़ेगा ही ।

एक किस्सा  सुनाती  हूँ  | आप जंगल में भटक गए हो  और आपके सामने  एक बीमार शेर है आपने उसकी मदद की वह शेर बिलकुल चंगा हो  गया  ज़ाहिर सी बात है आप एक्सपेक्ट कर रहे होंगे वह आपको नहीं खायेगा । जी आप बिलकुल गलत है ,वह आपको खायेगा जरूर खायेगा  “तंदूरी चिकन समझ के खाएगा ” विथ ऐडिशनल नीबू मिर्च लगा के  खाएगा । क्यूंकि जरुरी नहीं होता है अगर आप किसी के लिए अच्छे हो तो सामने वाला भी आपके लिए अच्छा ही हो ।इसलिए आकांक्षा उतनी ही रखनी चाहिए  जैसे दाल में नमक स्वादाअनुसार अंग्रेज़ी में एक  शब्द  है  “be smart ” यह दुनिया एक जंगल की तरह है  हज़ारों शेर मिलेंगे |ख्वाहिशों  के लिए किसी ने कहा है  ” हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले ” |

अब  बात करे प्यार  जैसे पवित्र और भारी भरकम  शब्द   के इस ब्रेकअप भरे दौर में शायद इसकी परिभषा न दे पाउ क्यूंकि बिना आहत हुए प्रेम करना बहुत मुश्किल होता है  शायद यहाँ  भी खेल आकांक्षा का ही है ।  कुछ बातें अधूरी सी रह जाती है  अगेन अंग्रेज़ी  “sometimes there is no goodbye ” तब  आपकी ज़ेहन में बस यही ख्याल आता है  “एक बार उलझना  है तुमसे काफ़ी कुछ सुलझाने के लिए ” , लेकिन मतलब ही नहीं बनता क्यूंकि ज़िन्दगी के क़र्ज़ और ख्वाहिशें  का इतना बोझ होता है  कि फ़र्क़ भी नहीं पडता और वक़्त  भी नहीं  रहता  ।

 

 

 

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