दिल और दिमाग की धिशूम धिशूम जब भी हुई है बिल अपनी फीलिंग्स का ही फटा है

दिल और दिमाग की धिशूम धिशूम जब भी हुई है बिल अपनी फीलिंग्स का ही  फटा है | शायद लोग कन्फ्यूज्ड रहते है कि दिल और दिमाग की सोच अलग होती है , मैं नहीं मानता ऐसा | उसके पीछे रीज़न ये है कि दिल और दिमाग दोनों मेरे अंदर हैं शायद कुछ एक फीट की दूरी पर | नहीं यकीन है तो नाप के देख लो अपने हाथ से दिमाग और दिल के बीच की दूरी |

दिल बड़ा बेचारा सा है 

दिल बोलता है कुछ दिमाग सोचता है कुछ , लेकिन अक्सर ऐसा महसूस करता हूँ कि दिमाग की बात को दिल हमेशा मान लेता है मगर दिल की बात को दिमाग कभी नहीं मानता | दिल और दिमाग में लड़ाई हर वक़्त दिमाग की तरफ से शुरू की गयी होती है | दिल सीधा साधा किसी क्यूट बच्चे जैसा मासूमियत से बहुत कुछ करना चाहता है मगर दिमाग उसको याद दिलाता रहता है कि उसकी अब ये करने की उम्र नहीं रही या ये करना अब उसको अच्छा नहीं लगता , या लोग क्या सोचेंगें अगर वो ऐसा किया तो और इन सब बातों से दिमाग दिल की मासूमियत को छीनने लगता है |

धीरे धीरे दिमाग दिल पे हावी होने लगता है , और दिल सोचना बंद कर देता है | बचपन में दिमाग नहीं होता है बस दिल होता है , एकदम प्योर वाला दिल बिना किसी मिलावट वाला दिल | फिर जैसे जैसे उम्र बढती है दुनिया दारी समझ में आने के लिए दिमाग की एंट्री हो जाती है बाई डिफ़ॉल्ट | कहा जाता है कि दुनिया ऐसे नहीं चलती , बहुत से तिकड़म लगाने होते है , बहुत से दांव पेच सीखने होते है और उसके लिए दिल का नहीं दिमाग का होना जरुरी है |

दिल तो आज भी वही कोने में पड़ा धड़क रहा है , जरुरत है फिर से अपने अंदर के उस बच्चे को झाख्झोड़ने का जो आज भी हमारा इंतज़ार कर रहा है और दिमाग के इस रवैये से डरा है | चलिए उस दिल से थोड़ी देर बात कर आइये .

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