बचपन

हे बचपन,
तुम कहाँ हो गुम?
तुम क्यों मांगते हो भीख
ट्रेंनों में?
पढ़ने का हक़
तुम्हें भी तो है ।
हे बचपन,
तुम कलरव क्यों नही करते
क्यों धोते हो जूठे
बग्या में खिलने का
हक़ तुम्हे भी तो है।
क्या यह हार हमारी है
या इस समाज की?
जहाँ फुल मुरझा सा गया
आग बुझ सी गयी है
बस एक चिंगारी ही शेष है ||

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