अम्मा सेल्वी जयललिता की वो दिल को छू लेने वाली बातें कि “केवल मैं न रहूंगी , ये मझधार उमड़ती जाएगी “

वो महज एक राजनेत्री , अभिनेत्री या एक और दूसरी औरत नहीं थी | न वो इंद्रा गाँधी थी न ही वो लक्ष्मी बाई थी और न ही वो मधुबाला या नर्गिस थी | वो जय ललिता थी | वो अम्मा थी | वो आवाज थी उन तमाम लोगों कि जिनके हाथ को थामने की जगह बाकी लोगों ने झटक दिया था | वो सहारा थी उन लाखों घर का जिनका चूल्हा अम्मा के वजह से चलता था | वो सुकून थी उन तमाम गरीब माँ बाप की जिनकी बेटियों की शादी के वक़्त अम्मा की तरफ से एक तोला सोना , साड़ियाँ , बर्तन और पैसे विदाई के वक़्त अम्मा की तरफ से दिया जाता था | वो उम्मीद थी उन गरीब स्टूडेंट्स कि जिनकी पढाई को हाइटेक करने के लिए अम्मा ने फ्री में लैपटॉप बंटवाए | वो उस पानी की तरह थी जिसने आज की कमर तोडती हुई महंगाई में बस दो रुपैये किलो चावल जरुरतमंदों के लिए उपलब्ध करवाई | औरतों की इज्जत , औरतों की सम्मान उनके वक़्त में सबसे ज्यादा हुई | अम्मा की मर्द जात से हमेशा से कुछ राड़ा रहा |

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जिंदगी उनकी कभी भी आसां नहीं रही

जिंदगी उनकी कभी भी आसां  नहीं रही | आरोप लगते रहे , उनपे बहुत सी बातें लिखी गयी , उनके और MGR के संबंधों को लेके बहुत कुछ कहा गया | लेकिन वो खुद को इतना बिजी रखती थी कि इन बातों ने उन्हें कभी भी डिस्टर्ब नहीं किया | टॉप पे रहना उनकी मानो आदत बन चुकी थी | वो फिल्मों में नहीं आना चाहती थी लेकिन जब माँ के प्रेशर के बाद फिल्में करने लगी तो वो वह टॉप की हीरोइन बनी , वो भी एक लैंग्वेज नहीं बल्कि तमिल , तेलगु , कन्नड़ और कुछ हिंदी फिल्मों में उनके खूबसूरती और अदायगी ने ऐसा कमाल दिखाया कि रातों रात वो लाइमलाइट में आ गयी | फ़िल्मी परदे पे जब उन्होंने बिकनी पहनी तो मानो परदे पे आग लग गयी | इसके बाद एक ऐसा वक़्त आया जब MGR से उनकी नजदीकियां बढ़ने लगी और देखते- देखते जय ललिता ने MGR के साथ करीब 28 फिल्मों में साथ काम किया | MGR उस वक़्त तमिल फिल्मों के सुपर डुपर मेगा स्टार थे  और बाद में उन्होंने DMK पार्टी ज्वाइन कर ली और एक्टिव पॉलिटिक्स में आ गए | इस वक़्त वो एक ऐसे इन्सान का साथ चाहते थे जिस पर वो 100% ट्रस्ट कर सके | और यही जय ललिता के जिन्दगी ने पलटी मारी | MGR ने जयललिता को DMK पार्टी ज्वाइन करने को कहा , जयललिता MGR को अपना सब कुछ मानती थी , जयललिता कभी भी पॉलिटिक्स में नहीं आना चाहती थी लेकिन MGR के कहने पे वो आई और ऐसी आई की राजनीति में भी वो टॉप पे पहुंची और अंतिम सांस लेते वक़्त भी तमिलनाडु की CM बनी रही |

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अम्मा को दफनाया क्यूँ गया ,जलाया क्यूँ नहीं गया ?

अम्मा के लिए लोगों का प्यार ऐसे ही नहीं आया है | इसे अम्मा ने साल दर साल अपने काम से पाया है | अम्मा को दफना दिया गया ठीक उसी जगह जहा आज से तीस साल पहले उनके आदर्श , उनके गुरु और उनके जिन्दगी के सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी रहे MGR को दफनाया गया था | यूँ तो नियम के हिसाब से अम्मा को जलाया जाना चाहिए था क्यूंकि वो एक अयंगर ब्राह्मण थी लेकिन शायद उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि पूरी जिन्दगी जिस MGR को उन्होंने अपना सब कुछ माना उसी MGR के बगल में मरने के बाद वो भी रहे , जिन्दगी तो ऐसी जी ली की मिसाल बना दी ..मौत भी ऐसी थी कि किस्सा बन गया ….इसके बाद की बातें फिर कभी …अभी बस उस अम्मा के लिए …चेन्नई के वो दस लाख लोग जो अम्मा की एक अंतिम झलक पाने को सड़क के दोनों ओर  खड़े थे , चेन्नई के वो सारे लोग जो छोटे बच्चों की तरह रो रहे थे , चेन्नई की वो सारी सड़कें जो सुनसान पड़ी इस बात का इंतज़ार कर रही थी कि काश अम्मा की सवारी इधर से भी गुजरे …वो सब के पास अब बस अम्मा और उनकी यादें है जो आगे उन्हें और भी अम्मा के करीब ले जाएँगी

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