बच्ची बेटी औरत माँ और ये दुनिया

टूटी है वह

बेड़ियों   में  बंधे  है वह

मन की दशा  से लड़ी है वह

हर दर्द को सही है वह

तब भी निश्छल खड़ी है वह ।

 

अपने सोलह्वें  साल में

दिल की बातों को ,

दफ़न कर आयी है वह

कुछ इस तरह पिता की लाडली बेटी बनी है वह ।

आठारह्वें साल  में विवाह के बंधन में

बंधी  है वह

तब जाके समाज की संस्कारी बेटी

बनी है वह ।

 

अब जिंदिगी बदल सी गयी है उसकी

नये घर को सपनो से सजाया है

लो भाई. .!!!।पति की सच्ची अर्धांगनी बन गयी है वह

फिर भी निसब्ध खड़ी है वह ।

 

 

दुनिया की सौभायावती औरत,

बनी गयी है वह

माँ …………।

 

अब बंगिया के फूल बड़े हो गए

पंछी के भाति उड़ से गए

एक निराश  बुढ़िया रह गयी है वह

दुनिया से जीतते  जीतते खुद से हार खड़ी है वह

फिर भी अपने तेज़ से अद्भुत छठा बिखेरती है वह

पूरी जीवन वह हमारे  नाम   कर चल गयी  वह ।

प्रश्न यह है की ?

इतने संघर्ष और कुर्बानी के बाद

आज  भी समाज में दोयम दरजे

में क्यों  खड़ी  है वह ?

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