तेरी एक मुस्कान ही काफी थी दिल पिघलाने के लिये

तुम मुझ से पूछते हो
तुम मुझ से पूछते हो
तुम्हारी कौन सी बात
मुझे बुरी लगती है |
मैं तुम से कैसे कहूँ
तुम्हारी कौन से बात मुझे अच्छी नहीं लगती
अज़नबी से थे तुम
मासूम से लगे थे तुम
यू तो हज़ारों  शिकायत थी तुम से
पर तेरी एक मुस्कान ही काफी थी
दिल पिघलाने के लिये !!
ऐसी क़्या बात हुए की
तुमने मोड़ कर तक नही देखा |
तुम्हे खोने से डरती थी मैं
टूट सी गयी थी मैं
कही ग़ुम हो गयी थी मैं |
एक दरिया की  तरह
बह रही हू मैं
मुस्कान ग़ुम सी हों गयी
है मेरी |
असफल निशब्द खड़ी हू मैं
तब तुम्हें कुछ समझ ही
नहीं आया
अब बहुत आगे निकल
आयी हूँ
क्यूँ कि
आज फिर मरुभूमि में पानी निकल आया है
आज फिर दिल में हौसला बंध आया है
ना जाने यह बयार कहा से चली है
पर आज फिर हौसला उभर आया है ।
रस्सी कुछ यू हंस पड़ी पत्थर पर
कि हौसला का निशान उभर आया है
आज कुछ हुआ है कि दिल में हौसला का
तूफान उतर आया है
शरद का प्रभात |
क्यूंकि
कश्ती को लहरों  से डरना नही चाहिए
सुना है डरने से अक्सर कश्तियाँ डूब जाती है उषा की  गोद से निकल आया है ।

 

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