फतवा जारी कर दो कि दिल फरेबी हो चला अब,अब न फिजायें अपनी रही रहा न पाक जमीं अपनी

फतवा जारी कर दो कि

दिल फरेबी हो चला अब

अब न फिजायें अपनी रही

रहा न पाक जमीं अपनी

न वो खुसबू यहाँ की आबो हवा में है

न वो हुस्न यहाँ की वादियाँ में

वो तिजारत यहाँ के कोने कोने में है

जिसे कभी दुसरो के दीवाल पे लिखा करते थे

हाथों की लकीरों में सिलवटें पड़ने लगी है

कभी गुरूर था जिनपे अपने किस्मत बनाने पर

आज तार तार हो के बिखर जाना बेहतर है

कम्बखत अब कौन फिर से टुकड़े-२ कर के जोड़े लम्हें

आज न कल मिटटी तो सबने बनना ही है

क्या इंसान और क्या वक़्त

इंसान या तो जलेगा या कब्र में जायेगा

और वक़्त ऐसे ही गुजरता चला जायेगा

 

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