सफ़रनामा…!!!

बचपन से अब तक ना जाने कितनी ही बार मैंने रेलगाड़ियों में सफ़र की है| हमेशा से एक सवाल मन में रहता था, खिड़की के बाहर की दुनिया को देख कर कि सब पीछे क्यों जा रहा है| पूछने पर हर किसी ने वैज्ञानिक तौर पर सही ही जवाब दिया, पर इसका प्रभाव ज़िंदगी में अब समझ आ रहा है|

कुछ महीने पहले कि बात है, शनिवार की रात थी और हर बार की तरह उस दिन भी घरवालों से मिलने की उत्सुकता चरम पे थी| उस रात ऑफिस से निकलते-निकलते काफी देर हो चुकी थी, इस लिए सोचा कि सीधा स्टेशन ही निकल जाना चाहिए| काफी देर हो चुकी थी और बारिश की हलकी फुहारें भी चल रहीं थी, बड़ी मुश्किल से उस सुनसान रास्ते पर एक टैक्सी मिली| हाथ देने पर ड्राईवर ने टैक्सी रोक दी| स्टेशन के लिए पूछा तो पहले उसने मना कर दिया, लेकिन मेरी बेचैनी देख कर वो जाने को तैयार हो गया| मैं भी बड़ी जल्दी में था, इस लिए टैक्सी में सवार हो गया|

ड्राईवर ने बड़े ही रोमांचित तरीके से कहा, “साहब आप जहाँ जा रहे हैं, वहाँ से आप चाह कर के भी नहीं लौट पायेंगे|”

मैं उसकी इस बात को सुन कर थोड़ा घबरा गया| मैंने कहा, “तुम मुझे डराने की कोशिश तो नहीं कर रहे ना?” उन दिनों उस इलाके में लूट-पाट की घटना आम थी|

ड्राईवर ने हँसते हुए जवाब दिया, ”साहब! मेरी मानों तो मत जाओ| आप इस सफ़र को भुला नहीं पायेंगे|”

मैंने उसे चुप कराते हुए स्टेशन तक चलने को कहा| और उसके बाद से उसने ना जाने स्टेशन पहुँचने तक कितनी ही ऐसी बातें की|

काफी देर हो ही चुकी थी, आख़िरी ट्रेन के आने का वक़्त भी हो रहा था, तो मैंने उसकी बातों पर ध्यान ना देते हुए उसे उसका किराया दिया और जल्दबाजी में टिकट लेने पहुँचा| खिड़की पे पूछने पर मालूम हुआ कि सिग्नल में कुछ दिक्कत की वजह से ट्रेन थोड़ी देरी से आएगी| मैंने भी सोचा, “चलो अच्छा है, थोड़ा आराम कर लूँगा वेटिंग रूम में|” वेटिंग रूम में भी अच्छी-खासी हलचल थी| वहाँ बैठे-बैठे ना जाने कब आँख लग गयी| थोड़ी देर में ही किसी ने कहा, “भाई साहब! उठो ट्रेन आ गई है|” उठ कर वहाँ का नज़ारा देख कर मेरे होश ना जाने कहाँ खो गए| ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी थी, लेकिन कोई नही दिख रहा था आसपास| थोड़ा डर तो लगा लेकिन मैं ट्रेन के जनरल बोगी में जाके बैठ गया| ट्रेन बिलकुल खाली थी| मेरी कलाई की घड़ी भी बंद पड़ी थी| मन में ना जाने क्या आया, सोचा नीचे जाकर एक बार फिर देखता हूँ| जैसे ही दरवाजे तक पहुँचा ट्रेन ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली| मैं वापस चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गया| इससे पहले कि मैं कुछ और हरकत कर पाता, एक जानी-पहचानी आवाज ने मेरे कानों को दस्तक दी| उस आवाज को तलास्ता डब्बे के आखिर छोड़ तक पहुँच गया| वहाँ जाते ही मैंने मेरी पत्नी को देखा, जिससे मैं किन्ही हालातों की वजह से अलग हो गया था| उसे देखते ही मैं अपने आँखों को छलकने से रोक ना पाया| शायद उसकी मनोदशा भी वही रही होगी| वो झट से मुझसे लिपट गई| कुछ देर ऐसे ही बातें चली कि कैसे हम पहली बार मिले थे, कैसे प्यार में पड़े थे, वगेरह-वगेरह| कुछ ही समय के बाद उसने मुझसे कहा, “अब मेरा स्टेशन आ गया, मुझे जाना होगा|” मेरी उत्सुकता अब तक ख़तम नहीं हुई थी और ना ही मेरी बातें| उससे मैं थोड़ी देर और बातें करना चाहता था, बीते यादों को फिर से संजोना चाहता था, पर वो नहीं मान रही थी| जाने से पहले वो फिर मुझसे लिपट गयी| और मैं फिर से अपने आँसुओं को रोक ना पाया| उसे गले से लगा कर मैंने अपनी आँखें बंद कर ली जिससे कि मैं उन लम्हों को आँसुओं के साथ गँवा ना दूँ|

अचानक एक आवाज़ मेरी कानों तक फिर से आयी, जो मुझे जगाने कि कोशिश कर रही थी| हरबरा कर आँखें खोली तो उसने कहा, “भाई साहब! उठो ट्रेन आ गई है|” यह सब देख कर फिर से अटपटा लगा |अब मैं सपनो से पड़े था|

मैं बाहर प्लेटफार्म पर गया, ट्रेन आ चुकी थी, हर तरफ भाग-दौड़ मची थी, जो आम होता है किसी भी स्टेशन पर| ट्रेन में सीट ढूँढने में जादा दिक्कत नहीं हुई| मैं चुपचाप बैठा पूरी सफ़र में यही सोचता रहा कि ना जाने वो ड्राईवर कौन था, जो इतना कुछ जानता था, लेकिन अब मैं जानना भी नहीं चाहता था| उसने सच ही तो कहा था कि मैं चाह कर के भी इस सफ़र को भुला नहीं पाऊँगा| मेरी कलाई पे जो घड़ी थी वो अब भी बंद थी और वो शायद अब भी वही समय बता रही हो, पर अब मैं उन लम्हों को खोना नहीं चाहता था| ये शायद उसका प्यार ही था जो मुझे उससे इतनी दूर करके भी पास रखा था| पता नहीं उसने अपना वादा पूरा किया या नहीं जो उसने मरने से पहले मुझसे किया था, हमेशा साथ रहने का वादा| लेकिन अब मुझे इस बात की ज़रा भी चिंता नहीं थी, वो अब भी मेरे जहेन में जिंदा थी| मैं अभी मन की शान्ति के जिस गहराई में था उसी में डूब जाना चाहता था|

ट्रेन की रफ़्तार से तेज़ चल रही ठंडी हवा जो मेरे कानों को छू कर गुज़र रही थी, मानों मुझे समझाने की कोशिश कर रही हों, कि समय बीत रहा है और उसके साथ पीछे छूट रहे हैं कुछ रिश्ते| ऐसे रिश्ते जो छन्भंगुर हैं, जो समय का ही एक रूप है फर्क बस इतना है कि धुँधलाते-बीतते समय के साथ रिश्तों की अहमियत और गहरी हो जाती है|

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