सुनसान गली के नुक्कड़ पे जो कोई कुत्ता चीख-चीख के रोता है

सुनसान गली के नुक्कड़ पे जो कोई कुत्ता चीख-चीख के रोता है,जब लैम्प पोस्ट की गंदली-पीली घुप्प रौशनी में कुछ-कुछ सा होता है,जब कोई साया खुद को थोडा बचा बचा कर गुम सायों में खोता है,जब पुल के खम्भों को गाड़ी का गरम उजाला धीमे-धीमे धोता है,तब शहर हमारा सोता है…तब शहर हमारा सोता है!

जब शहर हमारा सोता है, तो मालूम तुमको हाँ क्या-क्या-क्या होता है?इधर जागती हैं लाशें जिन्दा हो मुर्दा उधर जिंदगी खोता है!इधर चीखती है इक हौआ खैराती उस अस्पताल में बिफरी सी,आँख में उसके अगले ही पल नरम मांस का गरम लोथड़ा होता है!इधर उठी हैं तकरारें जिस्मों के झटपट लेनदेन में ऊँची सी..उधर घाव से रिश्ते को देखें दूर गुजरती आँखें हैं जो रुखी सी!

लेकिन उसको ले के रंग-बिरंगे महलों में गुंजाइश होती है,नशे में डूबे जेहन से खूंखार चुटकुलों की पैदाइश होती है,अधनंगे जिस्मों की देखो लिपी-पुती सी लगी नुमाइश होती है,लार टपकते चेहरों को कुछ शैतानी करने की ख्वाहिश होती है,

वो पूछे हैं हैराँ होकर ऐसा सब कुछ होता है कब,वो बतलाओ तो उनको ऐसा तब-तब-तब-तब होता है……जब शहर हमारा सोता है..जब शहर सोता है….!!

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